यतो धर्मस्ततो जय:

धर्मक्षेत्र। भारत युद्ध में उपदिष्ट भगवद्गीता के चौथे अध्याय के आठवें श्लोक में श्रीकृष्ण वह कहते हैं जिसे राज्य के तीन आदर्शों के रूप में भी लिया जा सकता है: परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय दुष्कृताम् धर्म संस्थापनाय पहला सूत्र उपचारात्मक है, यदि सज्जन पीड़ित है तो उसे पीड़ा से मुक्ति दी जाय, अन्याय को समाप्त किया…

स्वर, वर्ण, मात्रा, छन्द, ताल, श्रुति – एक अस्फुट परिचय

आपने देखा होगा, वेदपाठी पाठ करते समय अपने हाथों को ऊपर नीचे करते रहते हैं। स्पष्ट सी बात है, संभवत: आपको पता हो कि वे चढ़ाव एवं उतार के अनुसार हाथों को हिलाते हैं। संगीत के सात स्वरों के बारे में भी आप ने सुना होगा, षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद, जिनके…

गायें, वृषाकपि, एकशृंग, वाराह और सरस्वती सिंधु (हड़प्पा) की प्रतीक विद्या

यास्क द्वारा ‘गौ’ के दिये गये अर्थों का अनुक्रम देखें तो हमें भारत में गाय की पवित्रता से सम्बंधित प्रश्न का उत्तर मिल जाता है। गाय पृथ्वी की पवित्रता का प्रतीक है। यवनों ने भी पृथ्वी को गाय के प्रतीक में ही देखा, गाइया।

पश्च दृष्टि भ्रम, योजना भ्रांति, आशावादी पक्षपात, आसक्ति : सनातन बोध – 12

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1  , 2, 3, 4 , 5 , 6, 7, 8, 9 , 10, 11से आगे  पिछली कड़ी में हमने व्यावहारिक अर्थशास्त्र पर सांख्यिकी के प्रभाव को देखा, जिसमें हमने कई विशेषज्ञों के अपने स्वयं के अधूरे ज्ञान से अनभिज्ञ रहने की बात की थी। पश्च दृष्टि भ्रम (hindsight…

आदिकाव्य रामायण से – 18 : सुंदरकाण्ड [विवेकः शक्य आधातुं]

इस सुषमा बीच भी मारुति चैतन्य थे। उन्हें रावण फुफकारते नाग समान लगा – नि:श्वसन्तम् यथा नागम् रावणम्, उद्विग्न और सभीत हो पीछे हट गये। वह वैसा ही लग रहा था जैसे स्वच्छ स्थान पर ऊड़द का ढेर पड़ा हो, जैसे गङ्गा की धारा में कुञ्जर सोया हो, माष राशिप्रतीकाशम् नि:श्वसन्तम् भुजङ्गवत्। गाङ्गे महति तोयान्ते प्रसुप्तमिव कुञ्जरम्॥