Category Archives: भारत विद्या

वैदिक साहित्य – 1

चेतना के स्तर अनुसार वेदों के मंत्र अपने कई अर्थ खोलते हैं। कतिपय विद्वानों की मान्यता है कि किसी श्रुति के छ: तक अर्थ भी किये जा सकते हैं – सोम चन्द्र भी है, वनस्पति भी है, सहस्रार से झरता प्रवाह भी। वेदों के कुछ  मंत्र अतीव साहित्यिकता लिये हुये हैं। इस शृंखला में हम कुछ मंत्रों के भावानुवाद प्रस्तुत करेंगे।

शृंगार

उत्तुदस्त्वोत् तुदतु मा धृथा शयने श्वे, इषुः,
कामस्य या भीमा तया विध्यामि त्वा हृदि।।

आधीपर्णा काम शल्यमिषुम् सं कल्प कुल्मलां,
तां सुंसवतां कृत्वा कामो विध्यतु त्वा हृदि ।।

या प्लीहानं शोषयति कामस्येषुः सुखन्नता,
प्राचीन पक्षा व्योषा तथा विध्यामि त्वा हृदि।।

शुचा विद्वा व्योषया शुष्कास्यामि सर्प मा,
मदुर्निमन्युः केवली प्रियवादिन्नुव्रताः ।।

(अथर्ववेद, ३/२५/१,२,३,४)
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भावानुवाद

उठ बैठ प्रिये! सोती मत रह! उठ जाग, तेरा प्रेमी आया !!
तेरे उर को बेधने हेतु, मैं काम – बाण लेकर आया !!

हैं नोक कामना के इसके, संकल्पों के हैं कुल्मल-पर।
इस काम – बाण की तीक्ष्ण धार से बींधूं मैं तेरा अंतर।।

दिल जले, कलेजा सूख जाय, ऐसा यह बाण पुराना है।
फिर भी घायल होने को मन तरसे, यह सबने माना है।।

तूँ अपना अंतर बिंधने दे! हे प्रियभाषिणि! हे हे शुचिता!
मेरा मन रख ले आज प्रिये! उठ! आ! मेरी बाहों में आ!!

अनुवाद: श्री त्रिलोचन नाथ तिवारी

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 2

सनातन बोध : प्रसंस्करण, नये एवं अनुकृत सिद्धांत – 1 से आगे

विकासवादी मनोविज्ञान, जीवविज्ञान से प्रभावित एक सैद्धांतिक विषय है जो मनोविज्ञान और मानव स्वभाव की व्याख्या विकासवाद के परिपेक्ष्य में करता है। जिस तरह जीव विज्ञान में विकासवाद से जीवों के वर्तमान स्वरूप के क्रमिक विकास का अध्ययन और व्याख्या की जाती है, उसी तरह विकासवादी मनोविज्ञान में मानव व्यवहार की व्याख्या मस्तिष्क के क्रमिक विकास से की जाती है। जैसे जीवों के अंग पीढ़ी दर पीढ़ी वातावरण के अनुकूल होते गये, प्रकृति के चयन का सिद्धांत – योग्यतम की उत्तरजीविता से जीवों के अंगों में रूपांतरण आता गया। लाखों जीवों में से कई अनुकूल नहीं होने के कारण विलुप्त हो गये और उन्हीं में से एक बन्दर होता हुआ मनुष्य हुआ। विकासवादी मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि उसी क्रम में शरीर की ही तरह मस्तिष्क का भी अनुकूलन हुआ। उन बातों के लिए जो उत्तरजीविता और मानव प्रजाति के बने रहने के लिए जरूरी थे, मस्तिष्क उनके अनुकूल होता गया। जो बातें इसके लिए लाभकारी नहीं थीं वे मस्तिष्क से विलुप्त होती गयीं।

इन सिद्धांतों से हमें यह समझने में सहायता मिलती है कि संसार ऐसा क्यों है? हम किसी वस्तु को सुन्दर क्यों पाते हैं? हमें कुछ विशेष लोग अच्छे क्यों लगते हैं? हमें क्रोध क्यों आता है? हम किन बातों के पीछे पागल होते हैं? क्रोध, घृणा, प्रेम, आतंक, मित्रता, परिवार, शत्रुता, गर्व, सफलता, देश प्रेम की भावना जैसे अनगिनत गुण-दोष हमारे भीतर क्यों होते हैं? ऐसे कई प्रश्नों के उत्तर विकासवादी मनोविज्ञान में इस परिप्रेक्ष्य से सोचे जाने के प्रयास किये जाते हैं कि कि अंतत: इससे मानव जाति को क्या लाभ होता होगा। तब जब मानव शिकारी और संग्रहकर्ता का जीवन जीते और छोटे समूहों में रहते थे। अपने समूह की उत्तरजीविता और सफल प्रजनन (survival and reproduction) के लिए क्या महत्त्वपूर्ण था। ऐसी हर महत्त्वपूर्ण बात उत्तरोत्तर मस्तिष्क में स्थायी होती गयी और स्वार्थी गुणसूत्र उसे अगली पीढ़ी में स्थानान्तरित करते गए। जिन बातों से ऐसे लाभ नहीं थे वे मानव मस्तिष्क से मिटती गईं। जैसे जिनसे भयभीत होने या क्रोध आने से हमारे जीवित रहने की सम्भावना बढ़ी वे बातें मानव मस्तिष्क में समाहित हो गयीं, जैसे सामाजिक प्रतिष्ठा । ऐसी कई चीजें मानव जीवन का लक्ष्य बनती गयीं। प्रकृति ने सुख प्राप्ति को तो प्रोत्साहित किया पर सुख की अनुभूति को क्षणिक बनाया क्योंकि एक बार सुख प्राप्त हो जाने पर यदि मनुष्य रुक जाए तो प्रकृति के लक्ष्य में बाधा हो जायेगी। प्रकृति ने सुख प्राप्ति को मानव व्यवहार तो बनाया परंतु उससे प्राप्त होने वाली अनुभूति को अनित्य बनाया ! एक बार प्राप्त हो जाने पर और की इच्छा। इस सिद्धांत के हिसाब से मस्तिष्क के लिए चयन की शर्ते थीं, उत्तरजीविता और प्रजनन। सिद्धांत का निष्कर्ष – हमारे व्यवहार और सामाजिकता का कारण है हमारे पूर्वजों का शिकारी-संग्रहकर्ता और समूह में रहने वाला होना। जीने और कुटुंब बढाने के लिए जिस युग में जो महत्त्वपूर्ण और आवश्यक था वही मानवीय स्वभाव बन गया। क्रोध, प्रेम, घृणा, धैर्य, ईर्ष्या, करुणा… इत्यादि का मानव मस्तिष्क परिवेश के अनुसार चयन करता गया। मस्तिष्क के अनुकूलन का अर्थ हुआ ‘स्वार्थी जीन’ को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना।  

विकासवादी मनोविज्ञान के सिद्धांतों से एक निष्कर्ष निकलता है  – प्रकृति ने अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक भ्रम बनाया, सुख की मरीचिका। मानव मस्तिष्क इस तरह बनता गया कि उसे वो चीजें अच्छी लगने लगीं जिनसे प्रकृति के लक्ष्य (उत्तरजीविता और प्रजनन, Survival and Reproduction) को बढ़ावा मिले। विकासवाद और बौद्ध दर्शन पर अध्ययन करने वाले प्रिंसटन विश्वविद्यालय के प्रो. रॉबर्ट राइट इस निष्कर्ष पर कहते हैं कि प्रकृति का इससे कोई प्रयोजन नहीं था कि हम संसार को स्पष्ट देख सकें या हम सत्य को जान सकें। प्रकृति ने मस्तिष्क में एक मरीचिका बनाई। मानवों के उत्तम जीन को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के प्रकृति के लक्ष्य प्राप्ति के लिए मानव मस्तिष्क को सत्य दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं थी। प्रकृति ने मानव मस्तिष्क को इस तरह विकसित किया जिससे उसे ये मरीचिका स्थायी लगे, मनुष्य उसके पीछे भागे, उसे प्राप्त करना चाहे। इस मरीचिका का एक ही लक्ष्य है – मानव को प्रोत्साहित करना। ये आगे चलकर ‘पुरस्कार आधारित तंत्र, Reward based System’ बन गया- मस्तिष्क को एक संतुष्टि का आभास। परन्तु एक बार लक्ष्य प्राप्ति हो जाए और मनुष्य रुक न जाए इसके लिए प्रकृति ने मानव मस्तिष्क को असंतुष्ट बनाया जिससे अनंत इच्छा का जन्म हुआ। सुख के पीछे लगे रहो ताकि प्रकृति का लक्ष्य पूरा होता रहे और हर सुख, मोद अनित्य, क्षणिक।

इस सिद्धांत को प्रमाणित करने के लिए मनोवैज्ञानिकों ने कई परीक्षण भी किये। बंदरों पर प्रयोग हुये जिनमें बंदरों को काम करने पर दिए गए पारितोषिक से मिलने वाले सुख को उनके मस्तिष्क में होने वाले ‘डोपामिन‘ के स्तर में परिवर्तन से नापा गया। इस अध्ययन से इस सिद्धांत की पुष्टि हुई। मनोविज्ञान में इसे ‘हेडोनिक ट्रेडमिल’ भी कहते हैं। हेडोनिक अर्थात सुख विषयक और ट्रेडमिल अर्थात प्रयत्न करते रहना और वहीं का वहीं रह जाना। जीवन में आये अति सुख और दुःख के दिनों के कुछ दिन बाद पुनः सुख के उसी स्तर पर आ जाना। इसे आगे बढ़ाते हुए कुछ शोधकर्ताओं ने यह भी दिखाया की सुख का स्तर अनुवांशिक होता है।

यह हुआ आधुनिक सिद्धांत – स्वार्थी जीन का दृष्टिकोण।

By Michel wal (Own work) [GFDL or CC BY-SA 3.0], via Wikimedia Commons

यदि हम सदियों पहले जाकर बुद्ध के दर्शन को देखें, संक्षेप में ही नहीं गहराई में उतर कर तो उनकी कही बातों से यही निष्कर्ष मिलता है। चार आर्य सत्य और विकासवादी मनोविज्ञान के इस निष्कर्ष में कितना अंतर है? बुद्ध ने डोपामिन के स्तर की जाँच नहीं की, पर उन्होंने दुःख, दुःख के कारण और इच्छा पर आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व ठीक यही बात कही, स्पष्ट शब्दों में कही। इसके आगे यह भी कहा कि हम साधना से मस्तिष्क को सत्य दिखा सकते हैं – क्रमिक विकास से परे का सच !
ज्ञानी को नीर-क्षीर विवेकी परमहंस कहने की परम्परा कितनी पुरानी है? माया से परे सत्य देखने की बात? क्रमिक विकास की अनवरत असंतुष्टि से परे  – जब मिलिहैं संतोष धन। कितने सुभाषितों में आपने कामना की आग में घी डालने वाला होने की बात पढ़ी है? नेति -नेति। न्याय दर्शन का रस्सी को देख साँप का भ्रम होने का उदाहरण क्या है? बुद्ध कहते हैं कि जीव अनवरत इच्छा (तृष्णा) से ग्रसित है। इच्छा की पूर्ति अस्थायी है। जब हम रोग, वियोग, मृत्यु जैसी बातों से प्रभावित नहीं तब भी हम असंतुष्ट और अपूर्ण रहते हैं – संसार में दुःख है। बुद्ध द्वारा प्रस्तावित निवारण की विधियाँ मस्तिष्क की इस क्रमिक विकास से हुई परिणति से विपरीत उसे उलटी गति में ले जाकर सत्य का आभास कराती हैं।

विकासवादी मनोविज्ञान और इस सनातन दर्शन में क्या एक ही बात नहीं है? ‘हेडोनिक ट्रेडमिल’ का सिद्धांत पढ़ते हुए आप उसमें कितना नया पाते हैं? ‘जार्गन’ अगल होने के अतिरिक्त!


लेखक: अभिषेक ओझा

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर से
गणित और संगणना में समेकित निष्णात।
न्यूयॉर्क में एक निवेश बैंक में कार्यरत। जिज्ञासु यायावर।
गणित, विज्ञान, साहित्य और मानव व्यवहार में रूचि।
ब्लॉग:http://uwaach.aojha.in ट्विटर: @aojha